महामारी के बाद से चिंता यानी एंग्जाइटी और अवसाद के मरीजों में भारी वृद्धि हुई है। डेली मेल में प्रकाशित एक खबर के अनुसार महिलाओं में अवसाद और चिंता की शिकायत पुरुषों के मुकाबले 37 प्रतिशत अधिक होती है। रॉयल कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर के पूर्व कुलपति डॉक्टर डेम क्लॉर्क गेराडा के अनुसार अवसाद की शिकायत लेकर विशेषज्ञों के पास पहुंचने वाले 46 मामले अवसाद के नहीं होते। महामारी के बाद से लोग मामूली चिंता और परेशानी को भी अवसाद मानने लगे हैं और नकारात्मक होने लगे हैं। उनका मानना है कि ऐसे मामलों में अवसाद और एंग्जाइटी की दवाइयों से नुकसान पहुंच सकता है। उनका मानना है कि खासकर महिलाएं यह निर्णय लेने में जल्दबाजी कर रही हैं कि उनकी परेशानी दरअसल मामूली चिंता है या अवसाद। उनकी सलाह है कि अगर आपको किसी बात पर चिंता हो रही है, मन में नकारात्मक ख्याल आ रहे हैं, किसी काम में मन नहीं लग रहा, वजन बढ़ने या कम होने लगा है तो सबसे पहले अपने लिए वक्त निकालना शुरू कीजिए। सुबह और शाम तेज गति से चलिए। किसी शांत स्थान पर बैठ कर ध्यान कीजिए और शरीर को डिटॉक्स कीजिए। 27% मामले में इसी से आपको राहत मिल जाएगी। वे यह भी कहते हैं कि जिंदगी में रोज-बेरोज घटने वाली छोटी- मोटी बातों से परेशान होना हमें छोड़ देना चाहिए और बिना बात दवा नहीं लेनी चाहिए।
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