Home » Blog » जब घर टूटता है, तो इंसान चुपके से मर जाता है..

जब घर टूटता है, तो इंसान चुपके से मर जाता है..

Facebook
Twitter
WhatsApp

जब घर टूटता है, तो इंसान चुपके से मर जाता है…रात के ढाई बजे, दिल्ली के एक फ्लैट में 28 साल का सिद्धार्थ लैपटॉप बंद करता है। नौकरी चली गई है, EMI बाकी है, गर्लफ्रेंड ने छोड़ दिया है और माँ का आखिरी वॉट्सएप मैसेज है – “बेटा, कब आ रहा है?” जवाब देने की हिम्मत नहीं। सुबह पुलिस दरवाजा तोड़ेगी। सुसाइड नोट में सिर्फ एक लाइन होगी – “मैं किसी को बोझ नहीं बनना चाहता।”ये कोई एक कहानी नहीं। ये हर हफ्ते की खबर बन चुकी है। NCRB 2022 के आंकड़े कहते हैं कि हर दिन 467 लोग आत्महत्या कर रहे हैं। 2023-24 में यह संख्या और बढ़ी है। सबसे डरावनी बात – 35 साल से कम उम्र के युवा सबसे ज्यादा इस सूची में हैं। वो पीढ़ी जो इंस्टाग्राम रील्स बनाती है, स्टार्टअप खोलती है, कोचिंग के नाम पर जिंदगी दाँव पर लगाती है – वही सबसे तेजी से जिंदगी छोड़ रही है।सबसे बड़ा सवाल यही है – आखिर टूट क्या रहा है?घर टूट रहा है।

वो घर जो कभी संयुक्त परिवार का आँगन था, जहाँ दादी की कहानियाँ सुनकर बच्चे खुश होते थे, और चाचा-ताऊ का डाँट भी प्यार लगता था। अब दो कमरों का फ्लैट है, जहाँ माँ-पापा भी अलग-अलग मोबाइल में खोए रहते हैं। बच्चा जब रोता है तो माँ कहती है, “जा, यूट्यूब देख, कार्टून देख।” पापा कहते हैं, “मार्क्स ला, फिर बात करेंगे।” उस बच्चे का बचपन चुपके से मर जाता है। बड़ा होता है तो उसे लगता है – प्यार भी परफॉर्मेंस पर मिलता है।

शहरों में तलाक की दर 2020 से अब तक दोगुनी हो चुकी है। बुजुर्गों के लिए ओल्ड-एज होम बढ़ रहे हैं। विदेश जाने का सपना पूरा होते ही माँ-बाप “वीकली वीडियो कॉल” बनकर रह जाते हैं। रिश्ते “हाय-हैलो” और “हैप्पी बर्थडे फॉरवर्ड” तक सिमट गए हैं। इंसान अकेला नहीं होता – उसे अकेला कर दिया जाता है।फिर आता है पैसा। वो पैसा जिसके लिए दिन-रात मेहनत की, जिसके लिए कोचिंग की फीस भरी, जिसके लिए गाँव की जमीन बेची। लेकिन नौकरी नहीं मिलती। मिलती भी है तो एक ईमेल में चली जाती है। किराया, EMI, क्रेडिट कार्ड का बिल – सब मिलकर गला दबाते हैं। और जब घर में कोई पूछने वाला नहीं, तो इंसान सोचता है – “मर जाऊँ तो सबका बोझ कम हो जाएगा।”हमने मानसिक स्वास्थ्य को कभी गंभीरता से नहीं लिया। डिप्रेशन को “ओवरथिंकिंग” कहकर टाल दिया। रोने वाले लड़के को “लड़की जैसा” कहा। मदद माँगने वाले को “पागल” का तमगा दे दिया। परिणाम यह कि 90% लोग जो आत्महत्या करते हैं, उन्हें पहले से डिप्रेशन था, लेकिन इलाज किसी ने नहीं करवाया।

सबसे दुखद है वो खामोशी। जो लड़का ऑफिस में हँसता था, वो रात में रोता था। जिस लड़की ने स्टेटस लगाया “लाइफ इज ब्यूटीफुल”, उसने उसी रात फाँसी लगा ली। हमने कभी नहीं पूछा – “सच में ठीक हो ना?”आज समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है – हम कितने और घर टूटने देंगे? कितने और युवा चले जाएँगे? कितने माँ-बाप को यह खबर मिलेगी कि उनका लाल अब नहीं रहा?घर बचाना होगा।
बात करनी होगी।
बिना जजमेंट के सुनना होगा।
“तू फेल हो गया” की जगह “मैं तेरे साथ हूँ” कहना होगा।जिंदगी बहुत कीमती है।
और जिंदगी बचाने का सबसे सस्ता तरीका है – एक फोन कॉल।
बस इतना पूछ लो – “तू ठीक है ना?”शायद कोई सिद्धार्थ आज रात फाँसी का फंदा न लगाए।
शायद कोई माँ कल सुबह अपने बेटे का चेहरा देख सके।

vartahub
Author: vartahub

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *