आधुनिक समाज में तेजी से बदलते सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य ने कई सकारात्मक परिवर्तन लाए हैं, लेकिन इसके साथ ही कुछ ऐसी विडंबनाएं भी उभरकर सामने आई हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है बुजुर्गों की उपेक्षा। कभी परिवार और समाज के केंद्र में रहने वाले बुजुर्ग आज धीरे-धीरे हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। यह न केवल एक सामाजिक विडंबना है, बल्कि हमारे नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।पारंपरिक भारतीय समाज में बुजुर्गों को परिवार का आधार माना जाता था। उनकी सलाह, अनुभव और मार्गदर्शन को सर्वोपरि महत्व दिया जाता था। संयुक्त परिवार की व्यवस्था में बुजुर्गों की भूमिका न केवल परिवार के मुखिया के रूप में थी, बल्कि वे बच्चों के नैतिक और सांस्कृतिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देते थे। लेकिन वैश्वीकरण, शहरीकरण और एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस संरचना को तोड़ दिया है। आज की पीढ़ी, जो करियर और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं में डूबी है, बुजुर्गों के लिए समय और सम्मान निकालने में असमर्थ दिखाई देती है।इस विडंबना का एक प्रमुख कारण है आधुनिक जीवनशैली। युवा पीढ़ी की व्यस्तता, तकनीकी निर्भरता और स्वतंत्रता की चाह ने बुजुर्गों के साथ संवाद की खाई को और गहरा कर दिया है।
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के इस युग में, जहां लोग वर्चुअल दुनिया में घंटों बिताते हैं, बुजुर्गों के साथ बैठकर बातचीत करना या उनकी समस्याओं को समझना प्राथमिकता में नहीं रह गया है। नतीजतन, बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।आर्थिक दृष्टिकोण से भी बुजुर्गों की स्थिति चिंताजनक है। कई परिवारों में बुजुर्गों को आर्थिक बोझ के रूप में देखा जाने लगा है। उनकी पेंशन या बचत को अपर्याप्त माना जाता है, और उनकी देखभाल के लिए समय या संसाधन आवंटित करने में परिवार कतराते हैं। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि समाज में बुजुर्गों के लिए जगह कम होती जा रही है। यह स्थिति न केवल बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि उनके आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचाती है।सामाजिक बदलावों के साथ-साथ, मूल्यों में आए ह्रास ने भी इस समस्या को बढ़ावा दिया है। पहले जहां बच्चों को संस्कारों के तहत बड़ों का सम्मान करना सिखाया जाता था, वहीं आज व्यक्तिवाद और आत्मकेंद्रित सोच ने इस परंपरा को कमजोर कर दिया है।
बुजुर्गों को उनकी उम्र और अनुभव के कारण सम्मान देने की बजाय, उन्हें पुराने विचारों वाला या अप्रासंगिक मान लिया जाता है। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि समाज के लिए दीर्घकालिक नुकसानदेह भी है, क्योंकि बुजुर्गों का अनुभव और ज्ञान किसी भी समाज की अमूल्य धरोहर होता है।इस विडंबना का समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। परिवारों को चाहिए कि वे बुजुर्गों के साथ समय बिताएं, उनकी बात सुनें और उनकी जरूरतों को प्राथमिकता दें। सरकार और सामाजिक संगठनों को वृद्धजनों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं और मनोरंजन के अवसर प्रदान करने चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में बच्चों को बुजुर्गों के प्रति सम्मान और सहानुभूति का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि बुजुर्ग समाज का वह हिस्सा हैं, जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय परिवार और समाज के लिए समर्पित किया है। उनकी उपेक्षा करना न केवल एक सामाजिक विडंबना है, बल्कि हमारी मानवता पर भी सवाल उठाता है। यदि हम समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाएंगे, तो हम न केवल अपनी जड़ों से कट जाएंगे, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो मानवीय संवेदनाओं से वंचित होगी। ( शिवेंद्र कुमार सिंह )
