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कोचिंग संस्कृति: सफलता की दौड़ में कहीं बचपन तो नहीं हार रहा ?

कोचिंग संस्कृति
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संपादकीय। हर पीढ़ी अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य का सपना देखती है। भारत में भी यही सपना लाखों परिवारों को अपने बच्चों की पढ़ाई में हर संभव निवेश करने के लिए प्रेरित करता है। बेहतर शिक्षा, प्रतिष्ठित संस्थान और सुरक्षित करियर की चाह स्वाभाविक है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह सपना एक ऐसी दौड़ में बदलता दिखाई दे रहा है, जहाँ मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही कई छात्र मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक दबाव से जूझने लगते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या कोचिंग संस्कृति शिक्षा को मजबूत बना रही है या सफलता की कीमत कुछ अधिक ही भारी होती जा रही है?

भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का दायरा लगातार बढ़ा है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, सिविल सेवा, बैंकिंग, रक्षा सेवाएँ और अनेक अन्य क्षेत्रों में सीमित सीटों के लिए लाखों अभ्यर्थी प्रतिस्पर्धा करते हैं। इस कठिन प्रतिस्पर्धा ने कोचिंग संस्थानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बना दिया है। यह भी सच है कि अनेक छात्रों ने कोचिंग की सहायता से अपने लक्ष्य हासिल किए हैं। व्यवस्थित अध्ययन, अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन और नियमित अभ्यास कई विद्यार्थियों के लिए उपयोगी साबित होता है। इसलिए कोचिंग व्यवस्था को पूरी तरह नकारना वास्तविकता से आँखें मूँदने जैसा होगा।

लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। समस्या तब शुरू होती है जब कोचिंग एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता जैसी प्रतीत होने लगती है। जब यह धारणा बन जाए कि बिना कोचिंग सफलता संभव ही नहीं, तब शिक्षा का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूटने लगता है। धीरे-धीरे पढ़ाई ज्ञान अर्जित करने का माध्यम कम और केवल परीक्षा जीतने की रणनीति अधिक बन जाती है।

आज अनेक छात्र सुबह स्कूल, दिन में कोचिंग और रात तक स्व-अध्ययन की दिनचर्या में बँधे रहते हैं। उनके पास न खेल के लिए समय बचता है, न परिवार के साथ सहज बातचीत का अवसर और न ही अपनी रुचियों को विकसित करने की स्वतंत्रता। परीक्षा का दबाव, रैंक की चिंता और भविष्य की अनिश्चितता कई बार उनके मन पर ऐसा बोझ डाल देती है, जिसे वे किसी से साझा भी नहीं कर पाते।

इस स्थिति के लिए केवल कोचिंग संस्थानों को दोष देना उचित नहीं होगा। समाज की सोच भी उतनी ही जिम्मेदार है। हमने सफलता की परिभाषा इतनी सीमित कर दी है कि मानो जीवन में आगे बढ़ने का केवल एक ही रास्ता हो। यदि कोई छात्र डॉक्टर या इंजीनियर बन जाए तो वह सफल है, लेकिन यदि उसकी प्रतिभा किसी अन्य क्षेत्र में हो, तो उसे अक्सर उतनी गंभीरता से नहीं देखा जाता। यह सोच बच्चों को उनकी रुचि से अधिक दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीने के लिए मजबूर करती है।

अभिभावकों की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है। हर माता-पिता अपने बच्चे का उज्ज्वल भविष्य चाहते हैं, लेकिन भविष्य की चिंता कभी-कभी वर्तमान की खुशियाँ छीन लेती है। तुलना, अत्यधिक अपेक्षाएँ और हर परीक्षा को जीवन का अंतिम अवसर मान लेना बच्चों के आत्मविश्वास पर गहरा असर डाल सकता है। बच्चों को लक्ष्य देना आवश्यक है, लेकिन उन्हें यह विश्वास दिलाना उससे भी अधिक आवश्यक है कि एक परीक्षा उनके पूरे व्यक्तित्व का निर्णय नहीं करती।

विद्यालयों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि स्कूल केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित रह जाएँ और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पूरी तरह कोचिंग संस्थानों पर निर्भर हो जाए, तो शिक्षा व्यवस्था का संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है। विद्यालयों को ऐसी शिक्षा देनी होगी जो छात्रों में जिज्ञासा, विश्लेषण की क्षमता, नैतिकता और जीवन कौशल विकसित करे। केवल अंक अच्छे होना एक शिक्षित समाज की पहचान नहीं हो सकता।

कोचिंग संस्थानों को भी यह समझना होगा कि उनके पास आने वाला प्रत्येक छात्र केवल एक रोल नंबर नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान है। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, लेकिन ऐसा वातावरण भी उतना ही जरूरी है जहाँ छात्र असफलता से सीख सकें, मदद माँग सकें और मानसिक रूप से सुरक्षित महसूस करें। सफलता का उत्सव मनाने के साथ-साथ संघर्ष कर रहे विद्यार्थियों के लिए भी समान संवेदनशीलता दिखाना समय की आवश्यकता है।

सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने भी चुनौती कम नहीं है। शिक्षा व्यवस्था को इस दिशा में आगे बढ़ाना होगा जहाँ गुणवत्तापूर्ण विद्यालयी शिक्षा स्वयं इतनी सक्षम हो कि अतिरिक्त कोचिंग हर छात्र की मजबूरी न बने। साथ ही छात्रों के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श, करियर मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को भी शिक्षा प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

सबसे बड़ी आवश्यकता समाज की सोच बदलने की है। हर बच्चा एक जैसा नहीं होता और न ही हर सफलता का रास्ता एक जैसा होता है। कोई विज्ञान में उत्कृष्ट होता है, कोई साहित्य में, कोई खेल में, कोई संगीत में और कोई उद्यमिता में। यदि हम हर प्रतिभा को समान सम्मान देना सीख जाएँ, तो शायद बच्चों पर अनावश्यक दबाव भी कम होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि एक जागरूक, संवेदनशील और आत्मनिर्भर नागरिक तैयार करना है। यदि इस यात्रा में बच्चे का आत्मविश्वास, मानसिक संतुलन और जीवन के प्रति उत्साह ही कम हो जाए, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा।

कोचिंग संस्कृति को समाप्त करना समाधान नहीं है। आवश्यकता इसे अधिक मानवीय, संतुलित और छात्र-केंद्रित बनाने की है। सफलता का सपना देखना गलत नहीं, लेकिन उस सपने की कीमत किसी बच्चे की मुस्कान, मानसिक शांति और आत्मसम्मान नहीं होनी चाहिए।किसी भी समाज की वास्तविक सफलता केवल टॉपर्स की संख्या से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने हर छात्र को सीखने, आगे बढ़ने और सम्मान के साथ जीने का अवसर कितना देता है।

शिवेन्द्र कुमार सिंह संपादक वार्ताहब

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Author: vartahub

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