डिजिटल युग में सोशल मीडिया अब केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह लोगों की दिनचर्या, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित करने वाली एक बड़ी शक्ति बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन सरकार ने 16–17 वर्ष के किशोरों के लिए रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक सोशल मीडिया पर डिफ़ॉल्ट कर्फ्यू लागू करने की योजना पेश की है। हालांकि यह पूरी तरह अनिवार्य नहीं होगा और उपयोगकर्ता चाहें तो इसे बंद कर सकेंगे, लेकिन इसका उद्देश्य युवाओं को देर रात तक स्क्रीन पर बने रहने से रोकना और उनकी नींद, पढ़ाई तथा मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना है।
ब्रिटेन का यह कदम केवल एक देश का नीतिगत निर्णय नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक नई बहस की शुरुआत है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर समय-सीमा तय करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप है, या फिर समाज के हित में उठाया गया आवश्यक कदम?
भारत में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। देर रात तक रील्स, शॉर्ट वीडियो और अनंत स्क्रॉलिंग की आदत युवाओं ही नहीं, बल्कि हर आयु वर्ग के लोगों की नींद, कार्यक्षमता और पारिवारिक जीवन को प्रभावित कर रही है। सुबह उठते ही मोबाइल और रात को सोने से पहले घंटों सोशल मीडिया पर बिताना आज सामान्य व्यवहार बन चुका है। इसका असर मानसिक तनाव, ध्यान भटकने, पढ़ाई में गिरावट और उत्पादकता में कमी के रूप में दिखाई देता है।दूसरी ओर, यह भी सच है कि सोशल मीडिया आज शिक्षा, व्यवसाय, पत्रकारिता, आपदा प्रबंधन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में किसी भी प्रकार का पूर्ण प्रतिबंध लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़े कर सकता है। इसलिए समाधान केवल “बैन” नहीं, बल्कि “संतुलित उपयोग” भी हो सकता है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यदि कभी इस दिशा में विचार किया जाए, तो सबसे पहले बच्चों और किशोरों के लिए आयु-आधारित सुरक्षा, अभिभावक नियंत्रण, स्क्रीन टाइम लिमिट और डिजिटल साक्षरता जैसे उपाय अधिक प्रभावी हो सकते हैं। साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि वे ऐसे एल्गोरिदम और फीचर्स पर नियंत्रण रखें, जो उपयोगकर्ताओं को घंटों तक स्क्रीन से चिपकाए रखते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या भारत में भी रात के समय सोशल मीडिया पर किसी प्रकार का कर्फ्यू या समय-सीमा लागू की जानी चाहिए?
इसका उत्तर आसान नहीं है। एक पक्ष कहेगा कि इससे युवाओं की सेहत और भविष्य सुरक्षित होगा, जबकि दूसरा पक्ष इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता में सरकारी दखल मानेगा। इसलिए यह बहस केवल कानून की नहीं, बल्कि समाज, परिवार, तकनीकी कंपनियों और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी की भी है।
डिजिटल भारत के इस दौर में अब समय आ गया है कि हम यह तय करें—क्या तकनीक हमारे जीवन को नियंत्रित करेगी, या हम तकनीक के उपयोग की सीमाएँ स्वयं तय करेंगे?
अस्वीकरण: यह लेख एक संपादकीय (Editorial) है। इसमें व्यक्त विचार विश्लेषण और सार्वजनिक विमर्श के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी सरकारी नीति का समर्थन या विरोध करना नहीं है। पाठकों को अपने विचार स्वतंत्र रूप से बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। शिवेन्द्र कुमार सिंह संपादक वार्ताहब



