संपादकीय | वार्ताहब | नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने केवल दुनिया के 11 प्रमुख उभरते देशों को एक मंच पर नहीं जुटाया, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में बदलती तस्वीर को भी सामने रखा। ऐसे समय में जब दुनिया युद्ध, व्यापारिक तनाव, प्रतिबंधों और बदलती वैश्विक कूटनीति से गुजर रही है, भारत की मेजबानी में हुआ यह सम्मेलन स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय मीडिया के केंद्र में रहा। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक सवाल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है—क्या कुछ विदेशी मीडिया संस्थानों ने BRICS सम्मेलन को इस तरह प्रस्तुत किया, जिससे भारत की भूमिका और सम्मेलन की उपलब्धियां अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई दें?
इस सवाल का जवाब सीधे-सीधे ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना शायद उचित नहीं होगा। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कवरेज को देखने पर इतना जरूर दिखाई देता है कि कई प्रमुख विदेशी रिपोर्टों में सम्मेलन की उपलब्धियों की तुलना में उसके मतभेदों, आंतरिक चुनौतियों और सीमाओं को अधिक प्रमुखता दी गई।
उपलब्धियों से पहले मतभेदों की कहानी
सम्मेलन से पहले Reuters की रिपोर्टिंग में ही BRICS के सामने ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव को बड़ी चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया था। रिपोर्ट का फोकस इस बात पर था कि मध्य-पूर्व के युद्ध के बीच भारत किस प्रकार दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाने में सफल होगा।निश्चित रूप से यह एक वास्तविक कूटनीतिक चुनौती थी। BRICS में ऐसे देश शामिल हैं जिनके सामरिक हित कई मुद्दों पर एक-दूसरे से अलग हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी बहुपक्षीय संगठन की सफलता को केवल इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि उसके सभी सदस्य हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एक जैसा रुख अपनाते हैं?
शायद नहीं।
वास्तविक उपलब्धि तो यह थी कि इतने अलग-अलग हितों वाले देशों ने बातचीत के बाद संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाई और मध्य-पूर्व में अधिकतम संयम, संवाद तथा कूटनीतिक समाधान की अपील की। Reuters ने भी बाद में इस संयुक्त घोषणा और भारत की भूमिका को रेखांकित किया।
‘BRICS विफल हो रहा है’ वाली कथा कितनी सही?
कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों में BRICS के भीतर मतभेदों को इस तरह प्रस्तुत किया गया मानो संगठन अपनी दिशा खो रहा हो। पश्चिमी मीडिया में खासतौर पर यह प्रश्न उठता रहा कि क्या BRICS वास्तव में एक प्रभावी वैश्विक शक्ति बन सकता है या यह केवल अलग-अलग देशों का ढीला-ढाला समूह है।यह सवाल पूछना गलत नहीं है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की आलोचना होनी चाहिए। लेकिन आलोचना और एकतरफा फ्रेमिंग में अंतर होता है।
दिल्ली सम्मेलन में चीन, रूस, भारत, ईरान, यूएई, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका सहित विस्तारित BRICS के देशों ने एक साथ बैठकर व्यापार, स्थानीय मुद्राओं, भुगतान व्यवस्था, तकनीक, AI, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा तथा वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर चर्चा की। सम्मेलन में ईरान और यूएई के बीच उच्चस्तरीय संपर्क भी हुआ।अगर किसी मंच पर इतने अलग-अलग भू-राजनीतिक हित रखने वाले देश एक साझा दस्तावेज पर सहमत होते हैं, तो उसे केवल ‘मतभेदों’ की कहानी बनाकर देखना अधूरा विश्लेषण होगा।
भारत की भूमिका को लेकर असली कहानी
इस सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद BRICS से भी ज्यादा भारत की कूटनीतिक भूमिका थी।भारत एक तरफ अमेरिका, यूरोप और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक संबंध रखता है, तो दूसरी तरफ रूस, चीन, ईरान और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी संवाद बनाए रखता है।यही भारत की विदेश नीति की विशिष्टता है—किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखना।
दिल्ली सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत ने भी इसी रणनीतिक संतुलन को प्रदर्शित किया। Reuters ने मोदी-शी मुलाकात को दोनों देशों के संबंधों में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।इसलिए सम्मेलन को केवल ‘चीन का बढ़ता प्रभाव’ या ‘BRICS की पश्चिम विरोधी राजनीति’ के चश्मे से देखना भारत की स्वतंत्र कूटनीतिक भूमिका को छोटा करके देखने जैसा होगा।
क्या विदेशी मीडिया भारत के खिलाफ था?
यहां सावधानी जरूरी है।सभी विदेशी मीडिया को एक ही नजर से देखना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।कुछ रिपोर्टों ने सम्मेलन की कमजोरियों और मतभेदों को प्रमुखता दी। The Independent ने BRICS की आंतरिक असहमति को प्रमुखता से उठाया, जबकि अन्य अंतरराष्ट्रीय कवरेज में भी यह सवाल पूछा गया कि संगठन वास्तव में कितना प्रभावी है।लेकिन दूसरी ओर Reuters की सम्मेलन के बाद की रिपोर्ट ने इसे भारत के लिए कूटनीतिक सफलता बताया। Responsible Statecraft ने भी भारत द्वारा कठिन परिस्थितियों के बावजूद संयुक्त घोषणा हासिल करने को कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा।इसलिए यह कहना कि “पूरा विदेशी मीडिया भारत की छवि खराब करने में लगा था”, अतिशयोक्ति होगी।लेकिन यह कहना उचित है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से में BRICS की खबरों को देखने का नजरिया भारत की उपलब्धियों से अधिक उसके अंतर्विरोधों पर केंद्रित रहा।
आखिर भारत को इससे परेशान क्यों होना चाहिए?
शायद परेशान होने की जरूरत ही नहीं है।भारत आज जिस भू-राजनीतिक स्थिति में पहुंच चुका है, वहां उसकी छवि केवल विदेशी अखबारों की सुर्खियों से तय नहीं होगी।भारत की वास्तविक शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था, उसकी जनसंख्या, उसका बाजार, उसकी तकनीकी क्षमता, उसकी कूटनीतिक पहुंच और सबसे बढ़कर—विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच संवाद कायम रखने की क्षमता से तय होगी।BRICS की सफलता का अर्थ अमेरिका या पश्चिम की हार नहीं है। उसी तरह BRICS में भारत की सक्रियता का अर्थ यह भी नहीं है कि भारत किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन का हिस्सा बन गया है।
भारत की नीति इससे कहीं अधिक परिपक्व है।दुनिया बदल रही है, इसलिए नैरेटिव भी बदलेंगे,BRICS अब केवल पांच देशों का समूह नहीं है। इसका विस्तार और इसमें शामिल देशों की विविधता इसे वैश्विक दक्षिण की बदलती आकांक्षाओं का महत्वपूर्ण मंच बनाती है।स्वाभाविक है कि जिस व्यवस्था में दशकों तक कुछ ही शक्ति केंद्र निर्णायक भूमिका निभाते रहे हों, उसमें बदलाव आने पर इस बदलाव को लेकर अलग-अलग नैरेटिव सामने आएंगे।कुछ इसे अवसर के रूप में देखेंगे, कुछ चुनौती के रूप में और कुछ खतरे के रूप में।
यही कारण है कि भारत को विदेशी मीडिया की हर आलोचना को ‘भारत विरोधी षड्यंत्र’ मानने के बजाय उसे गंभीरता से पढ़ना चाहिए—लेकिन साथ ही यह भी देखना चाहिए कि क्या रिपोर्ट में भारत की वास्तविक भूमिका और उपलब्धियों को पर्याप्त जगह मिली है या नहीं।
निष्कर्ष
दिल्ली का BRICS सम्मेलन भारत की कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा था। और उपलब्ध तथ्यों को देखें तो भारत इस परीक्षा में कम से कम एक महत्वपूर्ण लक्ष्य हासिल करने में सफल रहा—विभिन्न हितों वाले देशों को एक मंच पर बनाए रखना और कठिन भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच साझा घोषणा तक पहुंचना।विदेशी मीडिया की आलोचना लोकतांत्रिक और वैश्विक विमर्श का हिस्सा है। लेकिन भारत को अपने बारे में लिखी गई हर नकारात्मक सुर्खी से अपनी सफलता या असफलता तय नहीं करनी चाहिए।
आज भारत के सामने असली चुनौती किसी विदेशी अखबार की हेडलाइन बदलना नहीं है।असली चुनौती यह है कि भारत जिस वैश्विक भूमिका का दावा कर रहा है, उसे आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक उपलब्धियों में लगातार बदलता रहे।क्योंकि अंततः किसी देश की छवि सुर्खियों से नहीं, उसकी वास्तविक शक्ति और उसके परिणामों से बनती है।यह संस्करण जानबूझकर “विदेशी मीडिया ने साजिश की” जैसे अप्रमाणित आरोप से बचता है। इससे लेख अधिक संपादकीय, विश्वसनीय और पत्रकारिता-सम्मत लगेगा और साथ ही यह सवाल भी मजबूती से उठेगा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भारत और BRICS को किस फ्रेम में प्रस्तुत किया।
शिवेन्द्र कुमार सिंह संपादक वार्ताहब



