कुछ वर्ष पहले तक शहरों की गलियों में, घाटों के किनारे और चौक-चौराहों पर किताबों के स्टॉल हर किसी की नजर में आ जाते थे। पुरानी पीढ़ी की यादों में आज भी ताजा है वह माहौल—जहाँ रंग-बिरंगी किताबें, उपन्यास, पत्रिकाएँ और कॉमिक्स की दुनिया आँखों को लुभाती थी। यात्री रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करते हुए पत्रिका, उपन्यास या प्रेमचंद की कहानियों की कॉपी उठा लेते थे। लेकिन आज हालात एकदम बदल गए हैं।
बनारस हो या दिल्ली, मुंबई, किताबों के वे पुराने स्टॉल अब दुर्लभ हो गए हैं। रेलवे स्टेशनों पर तो वे लगभग गायब ही हो चुके हैं। तेजी से डिजिटल होती दुनिया ने किताबों को ‘गुजरे जमाने की चीज’ बना दिया है।यह बदलाव केवल बाहरी नहीं, बल्कि गहरा सांस्कृतिक और भावनात्मक है।
स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स ने ध्यान को इतना बिखेर दिया है कि लंबे उपन्यास या गहन पत्रिका पढ़ने का धैर्य ही कम हो गया है।बनारस जैसे सांस्कृतिक शहर में यह बदलाव और भी दर्द भरा लगता है। अस्सी घाट पर या विश्वनाथ गली के आसपास कभी किताबों की दुकानें ज्ञान की छोटी-छोटी मंदिर जैसी लगती थीं। वहाँ बैठकर कोई छात्र प्रेमचंद पढ़ता, कोई साधक कबीर या तुलसीदास की पंक्तियाँ दोहराता। अब वे जगहें या तो बंद हो गई हैं या मोबाइल एक्सेसरीज़, स्नैक्स बेचने वाली दुकानों में बदल गई हैं।
रेलवे स्टेशन पर भी वही पुरानी AH Wheeler की किताबों की दुकानें, जो यात्रियों का सबसे अच्छा साथी थीं, अब धीरे-धीरे गायब हो रही हैं। मुंबई जैसे बड़े शहरों में तो हाल ही में कई स्टॉल्स को पूरी तरह हटा दिया गया है। जगह अब स्नैक्स और अन्य सामान बेचने वाली मल्टी-पर्पज स्टॉल्स ने ले ली है।यह सिर्फ किताबों का नहीं, बल्कि एक पूरी संस्कृति का क्षय है। उपन्यास हमें दूसरों की दुनिया में ले जाते थे, पत्रिकाएँ समाज की नब्ज पकड़ती थीं और कॉमिक्स बच्चों की कल्पना को पर देते थे। किताब पढ़ते समय जो एकांत, जो गंध, जो पन्ने पलटने की आवाज़ और जो गहरी सोच पैदा होती थी, वह स्क्रीन पर नहीं मिलती। डिजिटल युग ने सुविधा दी है—ई-बुक्स, ऑडियो बुक्स, लेकिन उसमें किताबों का वह जादू खो गया है जो कागज पर छपा शब्द पैदा करता था।
युवा पीढ़ी अब रील्स और चैट में खोई है। ध्यान की अवधि कम हो गई है। जो एक बार उपन्यास में खो जाते थे, वे अब १५ सेकंड की वीडियो में उड़ते फिरते हैं।फिर भी, कुछ उम्मीद की किरणें बाकी हैं। जो लोग अभी भी पढ़ते हैं, वे पहले से ज्यादा गहनता से पढ़ रहे हैं। महिलाएँ और बच्चे, जब समय मिलता है, तो घंटों किताबों में डूबे रहते हैं। कुछ किताबें अब भी बनारस के Harmony Book Shop जैसी दुकानों में मिल जाती हैं, जहाँ घाट का नजारा और किताबों की महक साथ-साथ है।
समाज को सोचना होगा..क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को केवल स्क्रीन की रोशनी देना चाहते हैं या किताबों की गहराई भी? स्कूलों में पढ़ने की घंटियाँ अनिवार्य हों, परिवार में किताब पढ़ने की परंपरा को फिर से जीवित किया जाए। प्रकाशक डिजिटल और प्रिंट दोनों को संतुलित रखें। सरकार और नागरिक समाज मिलकर पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा दें।किताबें सिर्फ कागज के ढेर नहीं होतीं। वे सपने, यादें, ज्ञान और भावनाओं का खजाना हैं। तेज डिजिटल दुनिया में अगर हम किताबों से दूर हो गए तो हम अपनी आत्मा से दूर हो जाएंगे।शहरों की गलियों में किताबों के स्टॉल दिखें, रेलवे स्टेशनों पर यात्री किताबें चुनें और बच्चे उपन्यासों में खो जाएँ—यह सपना अभी भी साकार किया जा सकता है। वरना, एक दिन हम केवल याद करेंगे कि “कभी किताबें भी हुआ करती थीं”




